• arvinddeepak 6w

    वो रात नहीं होती, अब वो दिन नहीं होता,
    सांसें थमे खातिर तेरे, अब मुमकिन नही होता।

    चलता हूं जब भी राहों पर, अकेला, थका, हारा,
    मील के पत्थर तो बहुत आते, पर रुकना नहीं होता।

    घटायें घेरती हैं आशमा, बारिश भी खूब होती है,
    इश्क़ के बूँद से हो दिल नम, अब वो सावन नहीं होता।

    मधुशाला संग प्रीत बढ़ी थी, तन्हा-तन्हा रहता था,
    जाम छलकते लब तक आते, अब पीना नहीं होता।

    जलता रहा विरह में तेरे, यादें ईंधन होती थी,
    "दीपक", यादें, विरह सब है, अब जलना नहीं होता।

    -अरविंद सिंह"दीपक"
    ©arvinddeepak