• vrishabh 15w

    हज़ारों टुकड़ो में बंट गया हूँ
    पर परवाह किसे है,
    अपने आंसुओं में खुद ही सिमट गया हूँ
    पर परवाह किसे है,
    हज़ारों बार लिख चुका हूं, की मेरी खुशी क्या है
    उम्मीदें लगाते लगाते थक गया हूँ
    पर परवाह किसे है।

    अनजाने रास्तो में भी कुछ राहगीर अपने से मिलते है
    पर अपने ही जब भटका दे मंजिलों से तो परवाह किसे है।
    किताबो में रोज़ लिखता हूं 'खत्म हो रहा हूँ'
    पर उसे कोई पढ़ भी ले ये परवाह किसे है।

    कहानी मेरी कभी जुबानों पे भी ना आएगी
    क्योंकि सच जानने की परवाह किसे है,
    मैं रोज़ मौत को पीता हूँ थोड़ा थोड़ा
    अब अगर पूरी मौत भी पी जाऊं तो परवाह किसे है।

    मैं भले ही अब अंधेरी रात हो चला हूँ,
    पर कोई दीया ले कर मेरा हाल देखने आए परवाह किसे है।
    शायद मेरे गुमशुदा होने का इश्तिहार देखोगे
    पर कोई मुझे पहचान भी पाए परवाह किसे है।
    ©vrishabh