• shikhar_t 25w

    एक बात रात से

    चलो पूछूगाँ कभी
    एक बात
    उस रात
    से ।
    तुम इतना शांत
    कैसे रह लेती हो?
    अधूरी हो रोशनी से
    फिर कैसे
    ये अंधेरा सह लेती हो?

    माना रंग काला तुम्हारा
    फिर कैसे इतना सज-सवर लेती हो।
    सितारो कि कुम-कुम लगा
    चाँद टीका सा पहन लेती हो।
    क्या जमाने की बातो का
    तुम पर,
    फर्क नहीं पडता?

    क्या तुम्हे डर नही लगता,
    खो जाने का।
    तुम्हारे लिए तो
    चिल्लाती राहें भी
    खामोश हो जाती हैं ।
    और खामोश गलियाँ भी
    चिल्लाती हैं
    कभी -कभी ।
    क्या तुम्हारा मन नही डरता?
    चलो,
    कभी अदालत में आकर
    गवाही दे दो ।
    तुम्हारे
    आगोश में ही तो हुआ था ।
    किसी कि इज्जत लौटाने का,
    क्या तुम्हारा अब मन नही करता?

    देश - विदेश
    टहलती हो रोज़।
    थकती नही हो?
    किसी रोज़
    पूर्णिमा में
    सुहागन सी सजती हो।
    किसी रोज़
    अमावस्या में
    अभागन सी उजडती हो ।
    थकती नही हो?
    क्यूं इंतजार
    कराते हो
    सिगांर को,
    साजन से मिलाने का।
    यूं रोज़ -रोज़
    टूटे दिल की सिसकियाँ सुनकर
    थकती नही हो?








    ©shikhar108