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    Sangram

    एक सच बेकारी में था
    अब खो गया हे ।
    लोग कहते हे, तू
    जिम्मेदार हो गया हे ।
    बेकार,तो नही
    आजकल काम,बहुत हे ।
    दिन,रात ना चेैन
    अंदर संग्राम बहुत हे ।
    खुद ही की खोज में
    स्वयं से बैर हे ।
    अंदर के अंतरिक्ष
    में रोज की सैर हे ।
    शरीर में ढूंढी रूह
    बस पहचान गलत हे
    दिन,रात ना चेैन
    अंदर संग्राम बहुत हे ।
    बाइक नही,कार से
    आज भी हो आता हूँ।
    दोस्त नही मिलते
    तो जल्दी लोट आता हूँ।
    फिर जिंदगी,जिंदा कहा
    ट्रेफिक में जा़म बहुत हे ।
    दिन,रात ना चेैन
    अंदर संग्राम बहुत हे ।
    थकान हे जीवन भर
    अंत में आराम बहुत हे।
    दिन,रात ना चेैन
    अंदर संग्राम बहुत हे ।

    © Lokesh Gautam
    ©lgblogger86