• sounvashistha 6w

    अब फिर वो शामें नही होती,
    अब वो बातें नही होती।

    कुछ तो जादू था उन दोस्तों में,
    पर अब वो मुलाकातें नही होती।

    मिट्टी की खुशबु अब भी वैसी है,
    बस अब वो बरसातें नही होती।

    मानो हसे जमाना हो गया,
    क्योंकि अब वो शरारतें नही होती।

    पेट तो अब भी भर जाता है,
    पर अब लंच में दोस्तों की महफिल नही होती।

    बातें अब भी हो जाती है उन दोस्तों से,
    पर अब बातों में वो मस्ती नही होती।

    बहुत याद आती है उन दिनों की,
    पर क्या करें दोस्तों....,
    अब खुदा की वो रहमत नही होती।
    ©sounvashistha