• malang_ki_malangai 23w

    पटरी

    तू ग़ज़ल होती,
    तो लफ़्ज़ों में क़ैद कर लेता
    तू जाम होती
    तो जी भर के पी लेता
    होती हवा तू अगर
    तो भर लेता बाहों में
    होती तू ग़ैर अगर
    तो माँगता दूवाओं में
    होती तू घर अगर
    तो बस जाता तुम्हीं में में
    होती तू रूह अगर
    तो समेट लेता खुदी मैं मैं
    ख़ुशी जो होती तू अगर
    तो पल में सो बार मनाता
    होती जो ग़म अगर
    तो ख़ून के आँसू रोता
    इतना रंग में रंगा हु तेरे की
    जो तू है, वो मैं हु
    रेल के पटरी सा रिश्ता ये फिर भी
    सामने तो हु, पर पास नहीं हु

    © सिताराम सागरे