• pragatisheel_sadhak_bihari 14w

    पाया बहुत मगर..........पर अब कुछ खोने को मन करता है,
    खोकर खास किसे भला......फिर से हँसने को मन करता है!

    बुलाकर पास अनगिनत चेहरे, उन्हें छोड़ने को मन करता है,
    छोड़ा जिन्हें फिर से उन्हें भला किसे पाने को मन करता है!

    रुला ही दिया जब मुझे जमाने ने........ हर रोज मेरे भावों में,
    फिर वो किस्सा...किन्हीं गैरों को न सुनाने को मन करता है!

    विधि का विधान है के जो हँसता है......उसे रोना भी पड़ेगा,
    तभी अब गफलत नहीं है सीना, मुझे सोने को मन करता है!

    अब कितना जागूँ इन राहों में........दिन में पेट का कब्जा है,
    रातों में यादों का पहरा,मुझे अब चुप रहने को मन करता है,

    कहते हैं जो मुकदर का सिकंदर होते हैं.......वो मिटते कहाँ,
    मर भी जाते हैं तो खुद्दारी की महक सूंघने को मन करता है!

    मिटाना क्या चाहेगा जमाना दोस्तों,खुद का नाड़ा जबढीला,
    बढ़ता मिटाने को जब,उसे तब बंद कसने को मन करता है!

    चंद पहर की ख़ुशी है उसकी......जब तक पाखंड का असर,
    मंद गति से किसने पाया,एक दिन हारा देखने को मन करता है!

    ©gatisheel_sadhak_bihari