• shashiinderjeet 26w

    #ग़ज़ल
    बंद थे दरो- दीवार, उठ रहा था धुआँ -गुब्बार
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    शैतान गाता था ग़ज़ल शैतानियत थी नाचती
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    था वीराना सा फ़लक थी ज़मीन भी कराहती
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    वक्त आया था सुनाने ढेरों से अपने अफसाने
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    बज उठी ज़ख्मों की सरगम दर्द था सुनता उसे
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    राग- ए- गम से फूटे गुल जो वो रहा चुनता उसे
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे

    ©shashiinderjeet
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    ग़ज़ल

    बंद थे दरो- दीवार, उठ रहा था धुआँ -गुब्बार
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    शैतान गाता था ग़ज़ल शैतानियत थी नाचती
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    था वीराना सा फ़लक थी ज़मीन भी कराहती
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    वक्त आया था सुनाने ढेरों से अपने अफसाने
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    बज उठी ज़ख्मों की सरगम दर्द था सुनता उसे
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे
    राग- ए- गम से फूटे गुल जो वो रहा चुनता उसे
    एक सन्नाटे की सूरत मैं रहा तकता उसे

    ©shashiinderjeet