• ajayamitabh7 5w

    दिल्ली की एक कड़कती रात
    अजय अमिताभ सुमन

    कड़कती ठंढ थी बड़ी वो दिसम्बर था महिना।
    घनेरी धुंध में मुश्किल हुआ था ठीक से चलना।
    इसी दिल्ली की सर्दी में जीने के वास्ते भाई।
    गया था मैं भी अपने ऑफिस के रास्ते भाई।
    निकलता मुख से था धुआं व सिमटे हुए थे लोग।
    मेरे भी माथे पे थी टोपी और सिने पे ओवरकोट।
    इसी कड़कती ठंडी में देखा कोई था चिथड़े में।
    कूड़े से ले लेके छिलके केले के डाल जबड़े में।
    कुत्तों से छिना झपटी कर रहा कूड़े के रास्ते।
    खुदा मैं दे रहा इल्जाम तुझे अभागों के वास्ते।