• gaurav_gargsar_shayar_sahab 13w

    हमसफ़र को मेरे , मेरा सफर ना पसन्द था ,,,
    मेरी मन्ज़िल रही प्यास , उसे समंदर ना पसन्द था ।।
    पसन्द ना पसन्द बदल गई थी तो उसे जाने दिया ,,
    मेरे माँ बाप की यादों का उसे घर ना पसन्द था ।।
    वक़्त भी मुझसे वो हर काम करा बैठा मजबूरी में ,,,
    जो करना क्या सोचना तक मुझे उम्रभर ना पसन्द था ।।
    छोटा था तो गली गली भटकता था दिन भर , वो बच्चा
    सुना है विदेश चला गया, अब उसे शहर ना पसन्द था ।।


    ©gaurav_gargsar_shayar_sahab