• quaintrelle_7 5w

    मुनाफ़ा!

    कि गुज़रेगी तमाम उम्र
    लोगों की
    बस ये कहते-कहते
    "क्यूँ समझूं मैं तुम्हें अपना!
    क्यूँ दूँ मैं साथ तुम्हारा,
    मुनाफ़ा क्या है आख़िर इसमें!,
    आदि।"
    सोचती हूँ
    कि ज़रूरी तो नहीं
    देखना मुनाफ़ा हर बात में!,
    किसी को तोहफ़े में
    दी गई मुस्कुराहट से
    क्या मुनाफ़ा निकालेगा इंसान!
    कैसे होगा इतना मतलबी
    कि भूल जाएगा
    कि दिल से दिया करते हैं
    तोहफ़े,वक़्त और आशीर्वाद।
    कभी-कभार समझ लेते हैं
    किसी को अपना
    इंसानियत के नाते भी।
    दे देते हैं साथ
    हाथ पकड़ कर
    ता-उम्र भी
    महज़ किसी के होंठों की मुस्कराहट के लिए ।
    कर देते हैं सारी ख़ुशियां कुर्बान अपनी
    किसी का एक ग़म भुलाने के लिए भी।
    पड़ सकती है हक़ीक़त मिटानी अपनी
    कभी-कभी
    किसी का एक ख़्वाब
    बुनने में मदद करने के लिए।
    नहीं चाहिए होता
    कोई मुनाफ़ा
    हमेशा,
    या फ़िर
    "किसी के चेहरे की चमक की वजह,
    और होंठों की हल्की-सी मुस्कुराहट बन जाना"
    शायद इस से बड़ा मुनाफ़ा भी क्या होगा
    ज़िंदगी में
    पल-भर सो जाने के लिए
    अँधेरी और अकेली रातों में!

    शायद इसके अलावा
    और कुछ भी मुनाफ़ा नहीं होता!
    ©quaintrelle_7