• saritaaroras 14w

    खड़ी थी मैं जाने क्या सोच...
    कि शायद जाते-जाते वो वक्त..वो लम्हे मुड़ आयेंगे
    कुछ आशा..कुछ निराशा में झूलती
    लगा था..शायद कोई फिर से मना लेगा मुझे
    पकड़ के हाथ..किसी हक से बिठा लेगा मुझे
    न जाने कियूं देखा था..कुछ उम्मीद भरी नज़रों से
    समझा कोई..लेकिन समझ कर भी कुछ कह न पाया
    सरकता रहा वक्त..दो जुदा जिस्मों के बीच धीरे-धीरे
    रह गये फासले...सदियों से लम्बे..जो तय न कर सके हम
    ना जुदा कर पाए ख़ुद को..ख़ुद अपने ही दिलों से
    जिस्म जुदा थे...पर रूह में अहसास वही एक था
    उठती तरंगे दिलों के दरमियाँ
    ...दोनों के मिलन का आभास करा गईं
    काश..!!..ये मिट्टी सब वही मिट्टी हो जाता
    और रह जाता वही...जो भीतर था
    तेरे मेरे प्यार की पराकाष्ठा थी...
    वो बीता वक्त..वो पल..जो इक गवाही दे रहा था
    तेरे मेरे रूहानी मिलन की..जो कण-कण में बिखरा हुआ था
    इक रूहानी इश्क...जो जिस्मों को अलग करके भी समाया था..तेरे और मेरे भीतर कहीं...
    और फिर उठ आयी मैं...इस ख़ामोश वादे के साथ
    कि बनके प्यार..तेरी रूह में रहूंगी हमेशा
    और मिलूंगी ज़रुर...
    तुझे..इस नहीं...तो किसी नए जिस्म के लिबास में
    ©saritaaroras