• shubham_pandey 19w

    तमन्नाऐ

    आरजू मेरी अमूल्य घड़ी की थी,
    जो हस्तविहीन को उत्थापक चलाता देख पूरी हो गई।

    अरमान मेरे कीमती जूते के थे,
    जो पहिएदार कूर्सी पर उसे सैर करते देख पूरे हो गए।

    चाहत मेरी अनमोल ऐनक की थी,
    जो ब्रेन लिपि से उसे पढ़ता देख पूरी हो गई।

    ©shubham_pandey