• drramanbiswash 14w

    *दर्द कागज़ पर,*
    *मेरा बिकता रहा,*

    *मैं बैचैन था,*
    *रातभर लिखता रहा..*

    *छू रहे थे सब,*
    *बुलंदियाँ आसमान की,*

    *मैं सितारों के बीच,*
    *चाँद की तरह छिपता रहा..*

    *अकड होती तो,*
    *कब का टूट गया होता,*

    *मैं था नाज़ुक डाली,*
    *जो सबके आगे झुकता रहा..*

    *बदले यहाँ लोगों ने,*
    *रंग अपने-अपने ढंग से,*

    *रंग मेरा भी निखरा पर,*
    *मैं मेहँदी की तरह पीसता रहा..*

    *जिनको जल्दी थी,*
    *वो बढ़ चले मंज़िल की ओर,*

    *मैं समन्दर से राज,*
    *गहराई से सीखता रहा..!!*

    *"ज़िन्दगी कभी भी ले सकती है करवट...*
    *तू गुमान न कर...*

    *बुलंदियाँ छू हज़ार, मगर...*
    *उसके लिए कोई 'गुनाह' न कर.*

    *कुछ बेतुके झगड़े*,
    *कुछ इस तरह खत्म कर दिए मैंने*

    *जहाँ गलती नही भी थी मेरी*,
    *फिर भी हाथ जोड़ दिए मैंने*


    ©drramanbiswash