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    पिताजी

    शायद आज बढ़ती उमर धोका देने लगी है, फिर भी उनके मुंह से उफ्फ भी नही निकलती है, मैं हैराण हूँ आज भी उनके लिए… सहम जाते है सब फिर भी अनज़ान बनते है! बचपन से आज तक सब नजरोंके सामने से गुज़रता है, जैसे वो पल कल ही गुजरा है! किस तरह उन्हों ने खुद को इतना तबदिल किया है! बेख़बर से रहते है वो… जैसे मुझे कुछ मालूम ही न है! मैं परछाई हूँ उनकी अब सब सहम जाता हूँ, हात लिया सब कुछ उनसे पर सच कहू उनके बगैर अधुरा हूँ! जीने की वो ऐसी उम्मीद है मैं मुक़मल कभी न कर पाऊ! उनके चरनों में है स्वर्ग मेरा… पर कभी मैं न बता पाता हूँ!

    अब भागदौड़ की जिंदगी है फिर भी उनके साथ हूँ! वो आईना है मेरा और उनका वजूद मेरा आयाम है!
    मेरे रब मेरे परवरदिग़ार सब कुछ बस मेरे पिताजी है!

    ©tera_mera_ek_safar