• being_adi 23w

    माफ करियेगा मगर मेरा बस ये कहना है कि किसी भी मसले पे राजनीति, धर्मनीति करने से बेहतर होगा अगर हम सब मुद्दे पे बात करे, हल ढूँढे और खुद को बदलें..कितनी बार ऐसा हुआ है जब हमलोगों ने "माँ-बहन की गाली" नही दी; किसी लड़की के बारे में अपशब्द नही कहा; या किसी परेशान महिला की मदद करी..सब कुछ हम पर ही निर्भर करता है..
    जब ऐसी घटनाओं का पता चला तो हमे बहोत बुरा लगा, पर उससे भी ज़्यादा बुरा लगा जिस तरीके से इस खबर को दिखाया या सुनाया जा रहा था..हद तो तब हो गयी जब इस हैवानियत को धर्म से जोड़ा गया..क्या दर्द और दरिंदगी का कोई धर्म या कस्बा हो सकता है क्या..
    शायद हम कुछ ज़्यादा ही बोल गए आज..बस अंत मे यही कहना चाहते हैं कि खुद को आँकना सबसे ज़रूरी बात है..और कृपया हर चीज़ में धर्म मत जोड़ा करिये..अगर हमने थोड़ा बहुत भी सही बोलै है तो मंथन ज़रूर करिये इसपे..��

    मिसदाक़ = proof
    मसनदनशीन = politician/power holder

    #hindiwriters #HUnetwork
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    बनकर जो सैलाब, आज अख़बार में उमड़ा है
    कल तो बस इसे धूल ही है खानी
    बेफिक्री से बैठो ऐ फ़िक्रमन्दों
    ये किसी और की बेटी की है कहानी
    यह लहू नही है उसके बदन का
    हैवानियत में बहा महज़ है पानी
    मिसदाक़ यूँ वारदात के खोज रहे हैं हर जगह
    बदन के घावों की भी तो है ज़ुबानी
    हनन कर इंसानियत का देवालय में
    हमें यहाँ धर्म की सेज है सजानी
    धर्म जात के बटकरे में तोलेंगे सबको
    मसनद-नशीनों तक ये बात है पहुँचानी
    बेज़ुबान के देह पे सियासी आग़ जला के
    ख़बर वालों को अपनी रोटी भी है पकानी
    वहश घूम रही है जब तक खुलेआम यहाँ
    तो किताबें कानूनी सब जल ही जानी
    आ जाये जो सामने मुज़रिम सारे फिर भी
    यहाँ कानून को तो हथकड़ियाँ है लग जानी
    गुनाह नही ये बस कुछ का
    यहाँ सबकी रूह है शैतानी
    ज़रा झाँक़ो तबियत से ख़ुद में
    अंदर बैठा होगा इक अक्स हैवानी
    मोम ज़रा पिघला देना सड़कों पे तुम
    जो इक रूह अब जन्नत में है जानी
    किस्से तो कई और भी होते हैं दरिंदगी के
    यहाँ पर किसको सुन्नी, किसको है सुनानी?

    ©being_adi