• rahulrsjain 34w

    " मुस्कान "

    मुद्दतों बाद , किसी का जिक्र
    जुबां पे आया हैं
    बिछड़ा हुआ परिंदा
    जैसे फिर जमीं पे लौट आया हैं
    शिरकत थी जिसकी आसियां बनाने की
    वो आसियानों में रहने का
    दर्द सीख आया हैं

    तु जो रहती ना
    तो अहसास होता था
    कि जैसें जिंदगी नही
    हर वक्त जी रहा हूँ
    अब तो
    अहसास भी हुए
    जमाना हो गया
    मेरे चेहरे का
    " मुस्कान" से नाता पुराना हो गया

    पुरी जिद तेरी थी ,
    थोड़े ख्यालात मेरे थें
    पुरा आँसमा तेरा था
    बस कुछ परिंदे मेरे थें
    मौत इक मर्तबा , सीने मे दफन हैं
    दुआओ में जिक्र होने के बाद
    खामोश हो चुके पल मेरे थे
    उसकें लियें , बनके रह गया सवाल
    दुनिया के सामनें ,
    उसकी खामोशी में छिपें
    सारें जवाब मेरें थें
    मैं जो हूँ
    तुझसें हूँ
    जो तु ना रही
    तो मैं क्युँ रहूँ

    ©rahulrsjain