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    फिर मन ने उड़ान भरी

    हाँ ! आज फिर मन ने उड़ान भर ठीक रॉकेट जैसी ,

    बोला - चलो आज अपना केंद्र छू ही लेते है ,

    पर जब उतरा तो भौचक्का रह गया ,

    सोच में के कौन सा स्थान छूवूँ !

    अंदर एक साम्राज्य है

    और शासक भी शासित भी,

    पीड़ाकर्ता भी भोक्ता भी

    यहाँ सभी के तो केंद्र है ,

    केंद्र के अंदर भी जो हैं उनके भी केंद्र है ,

    ये कैसा राज्य है ?

    जनाब मारकाट मची हुई है ,

    इतना खूनखराबा देख के

    पूछिए न कितने काम सामने खड़े हो गए ,

    उपचार तो है ही और साथ में

    मारकाट की रोकथाम तुरंत

    वर्ना उपचार तो अंतहीन हो जायेगा

    विकास कैसे होगा?

    मजा देखिये जरा ; ये दोनों सयाने अपने ही मर्ज से

    अपना इलाज करने में अक्षम और सक्षम भी ...

    आराम का तो सवाल नहीं काम ही इतना ज्यादा है ,

    हर जगह तोड़ फोड़ उत्पात ,

    आततायी असंतुलन में ,

    तभी मैं कहु देह में इतनी पीड़ा क्यों है।

    मेरे अंदर जो बसे मुझे पीड़ा मर्ज देने में एक पल नहीं सोचते ,

    मैं भी कहाँ सोचता हूं

    जिसकी देह में रहता हूँ उसे कितनी पीड़ा देता हूँ।

    आप सोचते हो क्या ?

    भई! मैं अपने से बाहर अभी तक

    जीवन देने की अभी तक नहीं सोच पाया ,

    बस संतुलन दे सकूँ वो ही बड़ा काम है।

    हमारे अंदर भी मौजूद हमें संतुलन दे सके,

    यही बहुत है...

    वे हमें जीवन देंगे इसका पता नहीं

    वैसे करोड़ों तन्तूओं में कुछ ऐसे भी है

    जो जीवन देने की सोचते है

    हमारे अंदर भी विचारवान तंतु ऐसे हैं

    हमारे समाज में बाहर भी ऐसे विचारक हैं !

    मानव को छोड़िये , प्रकति में ही ऐसे जीव मिलेंगे

    जिनकी उपस्थ्ति मात्र से प्रकति को बल मिलता है

    संभवतः अभी हम तो संतुलन की सोच प् रहे है

    और अंदर भी अपने सामूहिक संतुलन की ही अर्जी दिए हैं।