• ehsaas_arav 14w

    रास्तों के शोर घनेरे जो रात में गूंजा करते हैं
    सुनसान भले वो लगते हैं पर राज दफन भी उनमें हैं
    कई बार निगाहें चुपके से वहाँ निगरानी सी करती हैं
    कहीं अपराधों की बस्ती है कहीं शोर चिताएँ करती हैं,

    बड़ी दूर खड़ा वो बंदा बड़ी खोजबीन में लगता है
    कभी खेल अनाड़ी रचता है कभी तांकाझांकी करता है
    टंगा हुआ जो थैला है वो उसपर भारी लगता है
    ये रात ही इतनी काली है या ये संदिग्धों का मेला है,

    फिर नई सहर जो आयेगी ये सब बिल के अंदर जायेंगे
    रैना की दस्तक जो होगी ये फिर अपना थैला उठायेंगे
    कब गुत्थी ये सुलझेगी और कब हैवान ये सुधरेंगे
    अपराधों का ये गंदा खेल कब तक निर्बल भुगतेंगे।

    ©ehsaas_arav