• zariie 37w

    इक वक्त था जब उसने उसका सारा दर्द बाँटा, जीने की राह दिखायी. फिर धीरे धीरे उसीने ज़ख्म देने शुरू किए और वो हँसकर हर सितम सहती रही, हर गलती, हर झूठ को नज़र अन्दाज़ करती रही सिर्फ इसलिए कि रिश्तों की एहमियत थी उसके नज़दीक. आज वो उस मक़ाम पर खड़ी है जहाँ न मुहब्बत बाक़ी रही और न नफ़रत. वो तो अपनी ज़िन्दग़ी जी ही लेगी. क्या कभी उसे एहसास होगा कि उसने क्या खोया है?

    ©zariie