• trishavi 6w

    जब कुछ नहीं था मेरे पास तब एक नज्म थी तुमहारी,,
    एक सस्ती कलम, और किताबो से भरा बाबा आदम का झोला,, और मेरा गुनगुनाना फिर तुम्हारा मुस्कुराना ।
    फिर ठंडी रेत पे बेठकर, संगम मैं उस लाल गोले (सूरज) का बुझना देखना,, और उसी बूझते से एक तिलसमी चाँद का जनम लेना, जिसके सफेद बदन पे तुम रात कि स्याही से गीत लिखते और खो जाते,और
    मैं अपनी ही हथेलियों कि गद्दी मे अपना सर गडा़ए तुम्हें तकती रहती ,फिर तुम्हारे ही स्पर्श कि थपकियों से चौंकर पूछती "गीत पूरा कर लिया, या आज भी प्रभात का दिपक यहीं जलाओगे "।।
    जब कुछ नहीं था मेरे पास तब तुम थे,, ,,
    ©trishavi