• pragatisheel_sadhak_bihari 23w

    रिश्ते

    आजकल खो जाते हैं कहीं रिश्ते.......................अहं के बाजार में,
    मिलती है बस क्षणिक तसल्ली......................वहम के व्यापार में!

    कुरेदो लहू को इतना ही................कि किसी का स्वाभिमान न मरे,
    एक दौर के बाद तस्वीर भूल जाता है इंसान........खुद के आभार में!

    लानत है खुद पे जो किये जाता हूँ ऐतबार...........हर अजनबियों पे,
    पर टूट जाता है मेरा गुरुर.....जब इंसान व्यस्त जलन के कारोबार में!

    कुसूर इतना मत कर...कि रिश्ते तो बचे पर मेरा वजूद ही मटियामेट,
    करूँ क्या रिश्तों का,जो रुला जाते,जब झुकता रिश्ते के सरोकार में!

    काश कलेजा मैं रखता हनुमान का,चिर के दिखाता प्यार संसार को,
    यह आस ही रहेगा,क्योंकि मैं मामूली इंसान,फंसा हूँ भ्रम मझधार में!

    सबों के पास होता है,जीने के लिए अपनी अपनी बेहिसाब तकलीफें,
    पर कुछ के लिए तकलीफों का जन्म गैरों से,वो भ्रमित जब संसारमें!

    "साधक" मिल लेता है धूल बन...........लोग छोड़ जाते हैं धूल झाड़,
    इल्जाम महज दे जाते जीने को, क्योंकि वो प्यारे हो गए झूठे प्रचार में!

    ©gatisheel_sadhak_bihari