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    पूर्ण कविता जल्द ही।

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    || बेकसूर ||

    नफरतों के इस समुद्र में कुछ ऐसे डूबे हुम्
    के तैरकर बचना चाहा तो किनारा मिल न पाया

    सोचा था खुद को बेक़सूर साबित ही कर देंगे
    हमारी बेगुनाही साबित सबूत भी न कर पाया

    इन्साफ की थोड़ी उम्मीद लगा बैठे थे उनसे
    न मिला तो खुद को भीड़ में भी तनहा पाया।