• zindagi_ek_khwab_si 6w

    ग़ज़ल

    अकेलेपन के इस दौर में मैं अक्सर सोचता हूं
    आज वो जो मेरे साथ होता तो ना जाने क्या होता..

    सोचा जब ग़ौर से कि जो यूं होता तो क्या होता
    तो जाना कि मंज़र ही ये शायद कुछ नया होता...

    बिन आफ़ताब कहो नूर का क्या ज़रिया होता
    वो जो होता आफ़ताब-ए-चश्म का ना ये दरिया होता..

    मेरी जिस बात पर वो याद मुझको करता है
    जो मैं वो बात ही ना कहता तो ना जाने क्या होता...

    हुई जब खुद से बहस तो गम था इश्क होने का
    जो ना इश्क होता तो ना आज खुद ये गिला होता...

    देखकर रकीब को संग उसके मैं ये सोचता हूं
    जो ना करता गलतियां तो साथ उसके मैं खड़ा होता...
    ✍️ Zindagi_ek_khwab_si
    © Shubham Pandey