• drajaysharmayayaver 15w

    चरमसुख

    हम शरीर से मिले,
    बस शरीर रह गए।
    रेत के महल कई,
    बाढ़ आते ढह गए।
    बुझ-जगी भूख फिर,
    प्यास फिर नई-नई।
    हम यूँ ही पड़े रहे,
    हफ्तों-महीनों कई।
    रह गया कुछ अनछुआ,
    रह गया कुछ अनकहा।
    भूख-प्यास बुझ के भी,
    रह गया कुछ अनबुझा।
    दिल में कुछ पसीजता,
    मन कुछ था खीझता।
    साथ रह के भी कोई,
    अब भी था न रीझता।
    पूर्णता वो प्रेम की,
    सहज में मिली कहाँ।
    जानकर भी मैं उसे,
    जानता रहा कहाँ।
    अब आकाश साफ़ है,
    दिल भी साफ़-साफ़ है।
    गलतियाँ एक-दूसरे की,
    बिना शर्त माफ़ हैं।
    शक्ति से नहीं ये सुख,
    मखमली एहसास है।
    जीत में कभी नहीं,
    ये हार की मिठास है।
    ©drajaysharma_yayaver