• trickypost 16w

    �� इस रचना के माध्यम से कवि एक घटित घटना का चित्रण अपनी कविता के माध्यम से कर रहा है। कवि सवाल भी कर रहा है कि वक़्त के आगे किसी का जोर नही चलता, वक़्त की वार किसी भी इंसान फानुष कर देती है

    �� भावार्थः
    जिंदगी में कर्म से बड़ा कुछ नही है, आप कर्म करो समय आपको उसका परिणाम देगा, गलत और सही का फ़ैसला भी वक़्त ही करता है। आप अपनी संवेदना शब्दों और भाव के माध्यम से ज़ाहिर कर सकते है पर आप हक़ीक़त के पीछे छिपी सच्चाई को भांप नही सकते।

    @gatisheel_sadhak_bihari आपसे अच्छा इस वक़्त हमें समझने वाला और सुझाव देने वाला कोई और लेखक नही है इसलिए हमनें आपको इस रचना में tag किया है।

    @trickypost ��०२-०७-२०१८ ��१८:०१

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    दिव्यांग वाक्या

    बस राह चलते यू ही किसी से रूबरू हुआ,
    देखकर उसकी जद्दोजहद पग थम से गये,
    हाथ बढ़ाकर कहा कि मदद की क्या दरकार है,
    दो क़दम दूर रेल की पटरियों का जाल है।

    बड़े बे-मन से उसने इनकार किया,
    कहकर ख़ुद को दिव्यांग उसने हमारी भावना का तिरस्कार किया,
    फिर मैं चल पड़ा अपनी राह-ए-जिंदगी की तलाश में,
    वो बेबाकी से कर गया पटरी पार अपने ही अंदाज़ में।

    जो पीछे मुड़ कर देखा तो मैं स्तब्ध रह गया,
    वो दिव्यांग पटरी पार जो कर गया ,
    पर उसी पटरी के दूसरे छोर पर कोई मर गया,
    वक़्त का यह खेल हमे निःशब्द कर गया,
    मानो की संवेदना को कोई मार गया
    और बिना वज़ह कोई मृत्यु से आँखे चार कर गया।
    ©trickypost