• 25sam25 28w

    पाने के लिए तुम्हें मेरी चाहत भी नाकाम है,
    तुम्हारी मोहब्बत की ख्वाहिश मुझमें ख़ुद से ही गुमनाम है।
    पाने के लिए तुम्हें मेरी चाहत भी नाकाम है।

    उठा के निगाह ढूंडलो हमें,
    अब हम तुम्हारे पास नहीं हैं।
    जो सुन रही हो धीमी सी धुन,
    वो धड़कने हैं मेरी, महज़ आवाज़ नहीं हैं।
    नूर-ए-हसरत फूलों की, कम है तुम्हारे सामने।
    चाँदनी चाँद की, फ़ीकी है तुम्हारी नज़रों में।
    बँधी खूबसूरती भी जायज़ है बहारों की,
    पर बंद खूबसूरती में मेरा मेहनाज़ नहीं है।

    आ ही जाता है ख्याल तुम्हारा,
    न चाहते हुए मेरे खालीपन में भी।
    इबादत तुम्हारी अब मेरी हर सुबह हर शाम है।
    पाने के लिए तुम्हें मेरी चाहत भी नाकाम है।

    नसीब-ओ-राह में मुस्कुरा लेना,
    अगर हम मिलें कहीं।
    भूला हूँ सारे जहाँ को तुम्हारी आशिक़ी में,
    पर भुला पाया वो बीते सिलसिले नहीं।
    जो फ़ैसला है तुम्हारा, हमें भूल जाने का,
    वो फ़ैसला भी हमें क़ुबूल है।
    मिटा दो अपने निशां मेरे ज़ेहन से,
    न रहे फ़िर हममे कोई,
    अश्कों से भीगे वो गीले ज़मीं।

    आज फ़िर तुम्हारे गीत उठें हैं,
    आज फ़िर तुम्हारे राग-ए-जान से,
    गूँजा सारा श्मशान है।
    पाने के लिए तुम्हें मेरी चाहत भी नाकाम है
    तुम्हारी मोहब्बत की ख्वाहिश मुझमें ख़ुद से ही गुमनाम है।

    बस ज़रूरत है तो सिर्फ़ तुम्हारे फ़ासलों की,
    इस निगाह-ए-शोक से दूर,
    मेरी ज़िंदगी भी नीलाम है।
    पाने के लिए तुम्हें मेरी चाहत भी नाकाम है।।


    -18/12/13


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