• shivam_chourasiya 14w

    साजिश

    उमङते सैलावों के आँचल में
    किश्ती का पार होना
    यूँ तटो को छुना,
    फिर यूँ लहरों के आगोश में समा जाना-आना
    मर्म समझ में नहीं आता ,बिना धोखा खाए ।

    एक बार....... एक बार कहती है लहरे
    उस बे-जान पङी किश्ती से ।
    आ.. आकर टकरा इन लहरों से अपने किनारे,
    झँकार हो उठे शुन्य गगन में ।

    भरी उम्मीदों से आया भी वो किश्ती
    जीवंत-अनंत समुंदर में

    पर उम्मीदे तो तब खो गई
    जब मर्म हुआ...
    यहाँ तो, बुँदों की एक
    साजिश है

    ©shivam_chourasiya