• abhi7839034597 23w

    दिल की बेबसी

    प्रिये! तुम्हें भुलाने को न जाने कितने यत्न किए।
    किताबें, फिल्में, काम न जाने कितने प्रपंच किए।।
    मगर तुम बुर्जुआ वर्ग की महत्वकांक्षा सरीखी लगती हो।
    सबकुछ तो साधन है, पर साध्य तुम्ही दिखती हो।।
    कहते हैं कि हर स्थिति में परिस्थितियाँ ही दोषपूर्ण होती हैं।
    पर मानव सभ्यता बिन परिस्थितियाँ कहाँ बढ़ा करती हैं।।
    तुम्हें पाने की चाहत हठधर्मिता प्रतीत होता है।
    पर हाय! मेरा मन कहाँ ये यथार्थ दर्शन समझता है।।
    दिल तो तुम्हारे ही ख्वाब देखा करता है।
    ये भी जैसे अंधविश्वास व रहस्यवाद का उपासक लगता है।।
    ©abhi7839034597