• bscpoetry 15w

    नज़ारा

    यह बचपन का नूर हीं हैं जो सब अच्छा लगता हैं
    बड़े होकर तो सब कुछ ज़्यादा हीं सच्चा लगता हैं
    उस उम्र में सब कुछ खेल था हर वक़्त
    अब हम खेलों में फंसे हैं पल-पल
    न जाने फ़र्क कहा आगया यह उम्रों का
    कब कहां नज़ारा बदल गया नज़रों का
    ©bscpoetry