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    नज़ारा

    यह बचपन का नूर हीं हैं जो सब अच्छा लगता हैं
    बड़े होकर तो सब कुछ ज़्यादा हीं सच्चा लगता हैं
    उस उम्र में सब कुछ खेल था हर वक़्त
    अब हम खेलों में फंसे हैं पल-पल
    न जाने फ़र्क कहा आगया यह उम्रों का
    कब कहां नज़ारा बदल गया नज़रों का
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