• vipin_bahar 13w

    नई पेशकश
    ये मेरी नींदे न जाने क्यों आज तड़प रही हैं,
    ऐ सुनो..बताओ न कैसी हो मेरी आँख फड़क रही है,
    कुछ तो है जो दिल मेरा इतना ज्यादा मचल रहा है,
    तेरी खुशमिजाजी का फिक्र इस दिल मे चल रहा है,
    इन चिड़ियों के शोर में गजब की ख़ामोशी हैं,
    ये मौसम में भी न जाने क्यों इतनी उदासी हैं,
    ये चाँदनी भी न जाने क्यों खुद को बादलों से ढक रही हैं,
    ऐ सुनो...बताओ न कैसी हो मेरी आँख फड़क रही है,
    ये जो सुबह हुई है न फ़ीकी-फ़ीकी सी लग रही है,
    वो पहले जैसी नही अब जगमग रही है,
    हर दिशाएँ एक नया रूप गढ़ रही है,
    घड़ी कि सुईया बड़ी धीरे-धीरे बढ़ रही हैं,
    धड़कने बड़ी तेजी से धड़क रही है..
    ऐ सुनो..बताओ न कैसी हो मेरी आँख फड़क रही हैं...
    मैं जब लिख रहा हूँ न तो ये पन्ने खुद ब खुद पलट जा रहे हैं,
    ये शब्द मेरे न जाने क्यों यूँ ही सिमट जा रहे हैं,
    माथे पे चिंता कि लकीर छाई है..
    साथ नही दे रही अब मेरी लिखाई है,
    इस"विपिन"कि कलम अब थक रही है,
    ऐ सुनो...बताओ न कैसी हो मेरी आँख फड़क रही हैं,
    ये मेरी नींद न जाने क्यों आज तड़प रही हैं,

    विपिन"बहार"✍
    ©
    ©vipin_bahar