• sanjay_writes 6w

    एक बहुत पुराना रिस्ता हम क्यों तोड़ आए।
    हम उन आँखों को तन्हा अकेला क्यों भूल आए।
    गलियों से निकले हमसफ़र कि तो उनकि महकं को मोड़ आए।

    आँखों से निकले आंसूओ को बहा आए।
    प्यार सें लिपटी पुरानी यादो को दफ़ना आए।
    दुर क्या आ गए हम उन्हें तन्हां अकेला कर आए।

    चलते चलते ना जाने ये किधर चले आए हम।
    अकेले रह गए हम इस दुनियाँ में सब को खो आए।
    समुन्दर में ना जाने कितने भवंर को चिर आए।

    मोहबत के हसीं सफ़रो को त्याग आए।
    शामों में चुलबुली राते ओर सूँभा को भूल आए।
    सुबह की वो पहली किरण रात की चाँदनी को मुसाफ़िरों को दें आए।

    कोयल मैना की कूकती कूक को सजों आए।
    वो बारिस की पहली फूआर को महसूस कर आए।
    ये कैसे पल आये ज़िन्दगी में की सब कुछ आँखो में बसा आए।

    क्यों तन्हा अकेला कर के हम तुम्हे दुनियाँ के हाँथों में दे आए।
    आंगन वही है जों पहले था । मगर बचपन को कही खों आए।
    घर वही है जों पहले था । मगर बस घरवाले को कही खो आए।

    बगियाँ चोबरे वही है जो पहले थे । मगर बस सकुन को कही खों आए।
    अपने वही है जों पहले हूँआ करते थे । मगर बस अपनेपन को कही खों आए।
    आना वही है जाना भी वही हैं । मगर बस वो इंतज़ार को पाने कीं चाहत को खों आए।

    जो मेरा था सिर्फ मेरा हीं था।वो किसी और के लिए भूल आए।
    रूठना,मनाना, हक़ जताना।अब ये सब हम भूल आए।
    बट गया हिस्सों में अब।जो था टुकडों का प्यार उसी को भूल आए।

    उनकि बाहों में रहने का हक़ उन्हें अपना बनाने का सपना भी भूल आए।
    झूलती तख्ती उन कें नाम की मेरे भीतर । उन्ही के दिल में भूल आए।
    परिवर्तन की आंधी में इस क़दर बहकें । प्यार को ही तनहा भूल आए।

    मिलता था जिस ज़गहा उन से में । वो महखांने ही फोड़ आए।
    पीले पत्तो सा अस्तित्त्व हो गया मेरा । कोमलता को कही तोड़ आए।

    क्यों बहुत पुराना वो रिस्ता तोड़ आए।
    आँखो में लियें आँसू क्यों ना छोड़ पायें ।

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    अजीब खेल हैं इस दुनियाँ काँ