• nehulatagarg 11w

    करूणा का संचार हो। नायक अपने लिये नहीं अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिये उस संसार की रचनाकार्य में लगते है और अपने शरीर जीवन आत्मा और अपनी हर एक इच्छा और कामनाओं को उस यज्ञ की अग्नि में झोंक देते है जिसके जरिए वो मानव - मात्र के ऊँचे विश्वासों को , उनके मन मस्तिष्क और आत्मा में पाये जाने वाले सर्वोत्तम गुणों को और उनकी आन्तरिक योग्यता को उनके अनन्तर में पडे हुए उस सुसुप्त प्रकाश को बाहर ले आते है जिससे तो लाखों मानव उनके एक आह्वान पर अपना आत्मोत्सर्ग करने को तत्पर हो जाते है । यही नायक का नायकत्व ही तो होता है जो सबको स्वयं का नायक बना देता है और उसी के कारण तो लोग बंधी - बंधाई लीकों पर चलने के बजाय नवनिर्माण के मार्ग पर चल पडते है । एक ऐसा संसार जिसमें सब प्राणियों के व्यक्तिगत गुणों में सर्वोत्तमता हो और जिस तरह एक व्याधि शरीर के सुचारू संचालन को अवरूद्ध करती है देह के सभी अंगों को प्रभावित कर उनकी कार्यप्रणाली को क्षीण करती है उसी प्रकार राष्ट्र रूपी शरीर और मानवता रूपी आत्मा को भी एक ही व्याधि अमानवीयता राक्षसी प्रवृत्ति है जो नाना - नाना प्रकार की व्याधियों का रूप लेकर मनुष्य को प्रभावित करती है फिर चाहें उनमें स्वयंस्वार्थसिद्धी की भावना हो या किसी सत्ता सिंहासन के लालच के रूप में हो या स्वयं को ही सर्वश्रेष्ठ सर्वोत्तम और सम्पूर्ण संसाधनों और सम्पूर्ण संसार को अपना दास बनाने की महात्वाकांक्षा के रूप में हो या उन पर होने वाले किसी अन्याय या अत्याचार या भेदभाव के कारण उनमें पैदा हो जाने वाली सम्पूर्ण मानवता को विनाश के कगार पर पहुंचा देने वाली भावना हो या असहनीय कष्टों के कारण उपजी मानवता का नाश करने की भावना हो या अतृप्त इच्छाओं के कारण उनमें उत्पन्न हो आयी असमाजिकता हो या असवेंदनशील प्रेतों का सा अट्टहास करने वाले भयंकर और प्रलयंकर वज्रपातों से सम्पूर्ण मानवता को संत्रास करने वाले दानवी लक्षणों को प्रदर्शित करने वाले लोगों के कारण उपजी घोर

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    चित्रांगना

    निराशा हो या प्रचंड स्वार्थी तूफ़ानों और स्वयंहित झंझावतों के कारण दिग्भ्रमित हुयी मनुष्यता हो या उत्पीड़न और शोषणोन्माद के कारण घायल मनुजता हो या फिर हर एक व्यक्ति में पनप रही व्यक्तिकेन्द्रीयता हो या अविवेकी असंयमी अन्धश्रृद्धा और अन्धभक्ति से फैले अन्धविश्वासों से घिरे लोग हो या किसी भी तरह के व्यक्तिगत हित और स्वार्थ , लालच , मोह के सम्मोहन हो और अपनी अनर्थकारी अनुचित अतर्कशील आकांक्षाओं के वशीभूत होकर अपने कर्तव्य मार्ग से डिगने वाली मनोवृति हो या विविधता और विभिन्नता के कारण उपजा असंतोष हो या विषमता की धधकती अग्नि में धधकते अंगारों पर चलने की विवशता के कारण जन्में प्रतिशोध के नकारात्मक भाव हो या अतार्किकता और असहमति और वैविध्यपूर्ण वातावरण के कारण मन में आये हुए दुरर्भाव हो या डसते अमानुषिक विचारधारा वाले लोगों के कारण हार मानने वाली मानवता हो या नाश और विध्वंश का दंभ भरते तुच्छ मानसिकता और संर्कीण दृष्टिकोण और अवांछित मनोकामनाऐं यह सब व्याधियां जो इनसे ग्रसित और प्रभावित होते है वो तो दोषी है ही साथ ही सबसे बडे दोषी वो है जो इनको जीवन का सत्य मानकर अपनी बुद्धि विवेक को खोकर अनुसरण करते है इन व्याधीयों का तो सबसे बडी दोषी वो है जो इन सबसे डरकर हाथ पर हाथ धरकर बैठ जाते है और पथराये नेत्रों से अपलक राह को निहारतें ईश्वर से शिकायतें करते और उनसे प्रार्थना करते और इसी आस में अपना जीवन सबकुछ सहते हुए बिताते है की , कोई ना कोई देवपुरूष मनुजअवतारी अवश्य आयेगा जो उनका उद्धाररक पालक और रक्षक होगा वो तो सबसे बडी दोषी है तभी राजराजेश्वरी चहकती हुयी बीच में बोलती है , राजन चित्रांगद अपनी प्रजा में यही विश्वास भरना चाहते है यही राष्ट्रीय चेतना और इच्छाशक्ति जगाते है ताकि उनकी सम्पूर्ण प्रजा इन सब व्याधियों से मुक्त और स्वस्थ हो क्योंकि राष्ट्रीयता के पोषण के लिये उसकी स्वस्थता के लिये यह अतिआवश्यक है की , उस राष्ट्रीयता को जीने वाले उसे अपने जीवन का ध्येय बनाने वाले सुरमा