• kishore_nagpal 23w

    अपने अंदर एक तडप, एक बैचेनी, एक विरह, एक व्यथा पैदा कीजिये, अपने राम से मिलने की, अपने राम बात करने की, अपने गुरुजनो के दर्शन की ।
    एक ऐसी तडप जहाँ सारा संसार साथ में चल तो रहा होता है, पर मन की गहराई से हम सब के साथ होकर भी किसी के साथ नही होते है ।

    हर समय मन वहीं खोया रहे । किसी सुघड साधक से बात हो गयी मानो मन को, आत्मा को थोडी शांति मिल गयी । मौका ढूँढिये अपने गुरुजनो के सानिध्य को प्राप्त करने का, अपने मन की एक एक बात उन्हे कह देने का ।

    एक छोटा सा बच्चा है, अपनी हर बात माल से कहता है, पूरे भरोसे और निश्चल भाव से कहता है, जानता है, ये माँ है मेरी । इसे सब कुछ बोल दिया मानो अब निश्चिंत । अब जो करेगी माँ करेगी । ऐसा ही होता है ना जी ।

    ऐसी ही निश्चलता और पूरे भरोसे के साथ, अपने मन की हर दुविधा, जीवन की हर परेशानी, हर संकट को अपने गुरुदेव से, अपने राम से कह दीजिये । अगर भावो में पूरी पवित्रता और निश्चलता है, और अगर अपने राम पर, अपने गुरुजनो पर पूरा भरोसा है, कि जो करेंगें ये ही करेंगें,
    तो यकीन मानियेगा, गुरुजन सुनते भी है, और समाधान भी करते है ।

    मैं तो यहाँ तक कहता हूँ कि वे प्रारब्धो को काटकर भी समाधान देते है ।
    पर जरुरत सिर्फ उनके प्रति विश्वास, पवित्रता, निश्चलता, और समर्पण की है ।
    ©kishore_nagpal