• kishore_nagpal 13w

    अध्यक्ष तो हम बनना चाहते है, लेकिन साधक नही । ये मन का खोटा खेल है । सचिव तो हम बनना चाहते है, position, सत्ता तो हम अपने हाथ में रखना चाहते है, लेकिन समर्पित साधक नही ।

    सब मेरे अनुसार चले, सब मेरा ही कहा सुने, मुझसे पूछे बिना कुछ ना हो, मुझे हर जगह दूसरो से अधिक मान मिले, मुझे विशिष्ट के तौर पर देखा जाये, जहाँ मैं जाऊँ, सब मेरे आगे पीछे हो.......ये सब मन के खोटे खेल है ।

    दूसरो को तो सब को जप करने, ध्यान, सिमरण करने के लिये बोलना,
    जीवन में सत्य, शुचिता, पावनता, और आध्यात्मिकता के लिये दूसरो सभी को तो बोलना,
    हर घडी हर क्षण राममय रहते हुये, अपने नित्य के कर्मो में अति सावधानी से रहते हुये अपने मन मानस को पावन करते हुये जीवन में मिलने वाले सभी में अपने गुरुजनो को देखना.........ये सब दूसरो को तो अवश्य समझाना पर स्वयं के जीवन में ये सब ना उतार पाना, ये मन के खोटे खेल है ।

    मानो हमारा स्वयं साधना करने से ज्यादा दूसरो से साधना करवाने में interest है । बस लोग मुझे कुछ माने ।

    ये सब मन के खोटे खेल जो पहचान गया, समझ गया, समझो उसने साधना के पथ पर बाजी मार ली ।

    अन्यथा उसकी हालत उस कोल्हू के बैल जैसी ही रहती है, जो किसी एक खूँटे से बंधा रहकर उसके चारो तरफ दिनभर घूमता है, और शाम को उसे लगता है कि वह बहुत चल चुका है । लेकिन वह वही खडा होता है, जहाँ सुबह था । ऐसे लोग भी साधना के पथ पर कभी आगे नही बढ पाते है ।
    ©kishore_nagpal