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    पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी की यह रचना सोहर छ्न्दों में है और भगवान श्रीराम के विवाह के अवसर के नहछू का वर्णन करती है। नहछू मुख्य रूप से नाखून काटने एक रीति है, जो पूर्वी भारत में विवाह और यज्ञोपवीत के पूर्व की जाती है। यह विशेष रूप से नाई या नाइन व अन्य सम्बन्धित स्त्रियों के नेगचार से सम्बन्धित होती है। तुलसीदास की 'रामलला नहछू' रचना अवधी भाषा में है और सरल स्त्री लोकगीतोपयोगी शैली में प्रस्तुत की गयी है।

    'श्रीरामलला नहछू
    गजमुकुता हीरामनि चौक पुराइय हो।
    देइ सुअरघ राम कहँ लेइ बैठाइय हो।।
    कनकखंभ चहुँ ओर मध्य सिंहासन हो।
    मानिकदीप बराय बैठि तेहि आसन हो ।।४।।
    ( गजमोतियों, हीरों व मणियों से मण्डप में रंगोली बनाई गई है जहाँ चरण धुला कर प्रभु श्री राम को ले आकर बैठाया गया है। सोने के स्तम्भों से चारों ओर से सजे मण्डप के बीच सिंहासन है जहाँ आटे से बने चार बत्तियों वाले दीपक जलाकर प्रभु को विराजमान किया गया है।)

    बनि बनि आवति नारि जानि गृह मायन हो।
    बिहँसत आउ लोहारिनि हाथ बरायन हो।।
    अहिरिनि हाथ दहेड़ि सगुन लेइ आवइ हो।
    उनरत जोबनु देखि नृपति मन भावइ हो ।।५।।
    (नगर की स्त्रियाँ विधिवत श्रृंगार करके मातृ पूजन हेतु महाराज के महल आ रही हैं। लौहकार पत्नी लोहे का छल्ला लिए हँसती हुई आ रही है। यादव पत्नी हाथ में शगुन हेतु दही की मटकी लिए आ रही है। शुभ अवसर पर युवतियों के आगमन से महाराज का भी मन प्रसन्न हो रहा है।)

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    सरलार्थ
    ४,५

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