• kumarmukesh 5w

    सौदा

    सौदा हो रहा है, लाशें बिक रही हैं
    स्वपन क़ो कुचलकर, प्रथाएँ माँग भर रही है
    महावर खिल रहा है, मेहँदी महक रही है
    छुप-छुप कर सबसे आँख़े बरस रही है

    ज़िन्दगी की यह कैसी है असंगति
    कंठो की यह कैसी है विकलता
    फूलों से लिपटकर देह सिसक रही हैं
    सौदा हो रहा है, लाशें बिक रही हैं

    सेज पर है कोई , मस्तिष्क में कोई औऱ है
    बाहों में है कोई, नयनों में कोई औऱ है
    तक़दीर भी ग़जब का खेल रच रही हैं
    सौदा हो रहा है, लाशें बिक रही हैं
    कही दुनिया सज रही है, कही दुनिया उजड़ रही है
    स्वपन को कुचलकर, प्रथाएँ माँग भर रही है..
    ©kumarmukesh