• pragatisheel_sadhak_bihari 17w

    कलम

    "कलम" चलती नहीं यूँ शौक से........मन बहलाने को,
    "खबर" लेती है भौंक के.............झूठ को मिटाने को!

    "गुनाह" गवाह है........हम किस कदर खो चुके जमीर,
    "घर" में इज्जत नहीं.....बाहर दौड़ते प्यास बुझाने को!

    "चोर" के माफ़िक जीते हैं.....हम सब अपनी ज़िन्दगी,
    "छत" जो नहीं मिला संस्कारों का.....पुण्य कमाने को!

    "जरूरतें"इस कदर हावी है कि दिखता नहीं कोई नेक,
    "झरना" माफ़िक बहता बोल......गैरों में खो जाने को!

    "टालते"आये जो कल पे,जी लेने को दिल के छुपी राज,
    "ठहर"जाते सब,डर है गैरों के नज़रों से गिर जाने को!

    "डगर" अगर आसान नहीं, तो मुश्किल भी नहीं यारों,
    "ढक्कन"महज दूर होंगे,फिर से खुली हवा दे जाने को!

    "तबला"बजाओ बैठ कर,प्यार के कारोबार में"साधक",
    "थप्पड़ें" ही मिलेगी बस, भ्रम से सत्य में खो जाने को!

    ©gatisheel_sadhak_bihari