• aashish_nema 16w

    {सूफी-५}

    प्रेम प्रेम सब कोउ कहत, प्रेम न जानत कोइ।
    जो जन जानै प्रेम तो, मरै जगत क्यों रोइ॥

    ✒~ रसखान


    मन की श्रद्धा प्रेम है , प्रेम अटल विश्वास  ।
    प्रेम शशि में शीतलता , रवि मेंं प्रेम प्रकाश ॥

    तन के प्रेमी मूर्ख है , धन के प्रेमी चोर ।
    मन से मन को जोड़ती, प्रेम है ऐसी डोर ॥

    सृष्टि मानो भवन एक, अतिथि सारे जीव ।
    विपदा ईंट न हिला सके, प्रेम रहे गर नींव ॥

    माया-भंवर विशाल में , जो जन प्रेम से युक्त ।
    मृत्यु का भय न करें , हर क्षण चिंतामुक्त ॥

           ✒
    आशीष हरीराम नेमा
    ©aashish_nema