• nehulatagarg 12w

    अंगना चित्रांगद की मंत्रमुग्धता से थोड़ी असहज हो जाती है और चित्रांगद का ध्यान खुद से हटाने के लिये कहने लगती है - आपके राजदरबार जाने का समय हो गया है तो आपको प्रस्थान करना चाहिए तो चित्रांगद पर तो कोई असर ही नहीं होता और वो तो वैसे ही रहते है तो अंगना ही वहाँ से उठने ही वाली होती है की , चित्रांगद उन्हें जरा सा हिलने भी नहीं देते और कहने लगते है - अभी तक तो ठीक से देखा भी नहीं हमने आपको और वैसे भी बहुत दिवस हो गये है आपको देखें हुए तो अंगना चित्रांगद का ध्यान भंग करने की कोशिश करती हुयी कहने लगती है - बहुत दिनों की बात कहाँ से आ गयी और रोज ही तो देखते है आप हमें लेकिन चित्रांगद पर तो कोई असर ही नहीं होता । अंगना फिर से कहने लगती है - आपकी सब प्रतीक्षा कर रहें होंगे राजदरबार है और वैसे भी आपका मन तो हमें सुबह से लेकर रात तक देखने पर भी नहीं भरेगा तो चित्रांगद उनमें खोये हुए ही कहने लगते है - सहस्त्रों सदियों तक भी ऐसे ही देखना है आपको फिर अभी तो हमने आपको ठीक से देखा भी नहीं तो अंगना व्यंग्यपूर्ण अंदाज में कहती है - परन्तु हमें सहस्त्रों सदियों तक का जीवन नहीं चाहिए । रात को मृदुल प्रभावती के पास आती है और पूछने लगती है - आपने अंगना को कहीं देखा है की , बडी दादी माँ ? तो भाग्य श्री जो प्रभावती के कक्ष में ही बैठी होती है कहने लगती है - हाँ माँ , हमने भी अंगना को सुबह से ही नहीं देखा और तभी तिल्लोत्तमा और महालक्ष्मी भी चली आती है और वो भी भाग्य श्री और प्रभावती के पास सौंफें पर बैठती हुयी कहने लगती है - आज अंगना सुबह से ही दिखाई नहीं दी तो मृदुल कहने लगती है परेशान सी चिन्ता में डूबी हुयी - पूरे महल में देख लिया यहाँ तक की सबसे पूछ लिया और सुमन्त श्री के घर भी जा चुके है पर महैश्वर भैया को भी नहीं पता की , अंगना है कहाँ ? तो तिल्लोत्तमा कहने लगती है - परन्तु हमने आज ज्येष्ठ को भी नहीं देखा कहीं तो सब सोच में डूब जाती है और असंधिमित्रा आती है और कहने लगती है - कहीं यह दोनों साथ ही तो नहीं

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    चित्रांगना

    प्रभावती चित्रांगद के कक्ष की तरफ जाती है और द्वार पर दस्तक देती है और अंगना चित्रांगद को द्वार की दस्तक की तरफ ध्यान दिलाती हुयी कहने लगती है घबरायी सी - लगता है कोई द्वार पर है ? हमें लगता है की शायद घर वालों को पता चल गया है और ..। प्रभावती पुकारती हुयी कहने लगती है - पुत्र द्वार खोलियें लेकिन चित्रांगद पर तो कोई असर ही नहीं होता और अंगना की डर के मारे जान ही सूखी जाती है और जब दो - तीन आवाज पर भी कोई प्रतिउत्तर नहीं मिलता तो प्रभावती सोचती है शायद नहीं है चित्रांगद और जाने लगती है तो अंगना मन ही मन सोचती है की , कैसे प्रभावती रोका जायें और यदि वो यहाँ आ जायेगी तो ही शायद चित्रांगद का ध्यान भंग हो तो वो आवाज देती है उन्हें तो प्रभावती सुनकर ठिठक जाती है और वापस आती है और द्वार पर दस्तक ही देने वाली होती है की द्वार खुल जाता है और अंगना द्वार के पीछे छुप जाती है और चित्रांगद के पास पहुंचती है तो चित्रांगद अभी भी ऐसे ही बैठे रहते है तो उन्हें ऐसे देखकर प्रभावती सोच में पड जाती है और उनसे बोलने पर भी जब वो कुछ नहीं बोलते तो उन्हें झकझोरती हुयी कहने लगती है - क्या हो गया है आपको पुत्र ? ऐसा क्या देख रहें है जो आपकी दृष्टि ही नहीं हट पा रही तब जाकर चित्रांगद का ध्यान भंग होता है और वो हडबडायें से कहने लगते है - वो .. यहाँ ..। प्रभावती अचरज से भरी हुयी पूछने लगती है - वो यहाँ क्या ? तो चित्रांगद सकपकायें से कहने लगते है - कुछ नहीं तो प्रभावती फिक्र जताती पूछने लगती है - क्या बात है पुत्र ? हमें ज्ञात हुआ की आप प्रातकाल से ही कहीं भी दिखाई नहीं दिये तो चित्रांगद से जवाब देते नहीं बनता तो वो बहाना बनाते हुए कहने लगते है सर पकडकर - वो हमारे सर में आज सुबह से ही बहुत पीडा थी और अब तो हमारे दायें हाथ में भी होने लगी है और चित्रांगद अभिनय करने लगते है पीडि़त होने का और उधर अंगना मौका देखकर बाहर निकलकर दरवाजे से दहलीज पर आती है की , भाग्य श्री से टकराते - टकराते बचती है और वो उनसे उनकी हडबडाहट की वजह इशारों में पूछती हुयी कहने लगती है - आप यहाँ थी पुत्री