• kishore_nagpal 22w

    एकदम शुरु में जब नाम जपना शुरु करते है तो यही लगता है कि आज मैनें इतनी माला कर ली या आज इतनी देर ध्यान में बैठे ।
    काफी समय के बाद....
    काफी समय के बाद ही...
    जब जप लगातार चलता ही रहे...
    साधना चलती ही रहे...
    तब जाकर एक बार ये अहसास होता है कि नहीं मैं कुछ नहीं कर सकता था । ये तो प्रभु श्री राम की कृपा थी वे इस शरीर से ये करवा रहे थे । शायद ये अहसास होने के बाद ही राम जप शुरु होता है, वो भी तब जब बीच बीच में हमारे मन के कोने कोने में छिपा अभिमान अपना सिर ना उठा ले ।

    कई बार राम जी प्रत्यक्ष इस बात का अहसास करवाते है ।
    मैं खूब कोशिश के बाद भी रोज कई बार अभिमान के वश में आ जाता हूँ । एकबार मैं किसी साधक से बात कर रहा था । बातचीत में ही मैंनें बोला कि मैं रोज ...इतनी माला करता हूँ । रोज सुबह ...इतने बजे उठकर ऐसे ऐसे करता हूँ ।

    जो मेरा ये नित्य नियम वर्षो से चल रहा था, वह दूसरे दिन ही टूट गया । कुछ परिस्थतिया ऐसी बनती गयी कि कुछ भी पहले जैसा नहीं हो पा रहा था ।
    साफ था प्रभु मेरा अभिमान तोड मुझे अहसास करवा रहे थे...
    कि जो मैं दूसरे साधक को बोल रहा था कि मैं ऐसा जप करता हूँ आदि आदि...
    वो सब वास्तविकता मैं कुछ नही वरन् प्रभु ही करवा रहे थे ।
    ऐसे अनुभव कई बार होता है कि साधना तो क्या बाकी भी जीवन में सब कुछ प्रभु ही कर रहे हैं ।
    कई बार ऐसा सुना है कि जो कुछ जीवन में मिल रहा है वह अपने प्रारब्धो का फल है । लेकिन जब जब इस बात का भी अभिमान किया या माना कि ये जीवन में सब कुछ प्रारब्धो से मिला है...थोडे से समय या कुछ ही दिनो में प्रभु ने सिर पर डंडा मार कर ये अहसास करवा दिया कि नही जीवन का ये सब कुछ भी मेरी कृपा है...सब मे ही कर रहा हूँ ।

    प्रभु कृपा करियेगा..।
    कृपा करियेगा...।
    कृपा करियेगा...।

    मैं साधना या जप तो क्या प्रभु जी श्वास भी स्वयं नही ले सकता हूँ ।

    जय जय राम
    जय जय राम
    ©kishore_nagpal