• saipriya123 3w

    #Fiction

    बहुत कर ली तुमने मनमानियां अपनी,
    अब थोड़ी मुझे भी कर लेने दो

    उधड़े से एहसास जो जुबां में सिल रहे है
    वो लफ्ज़ जो अधरों पे तेरे कांप रहे हैं
    उकसा के उनको बाहर ले आने दो
    हक कुछ तो मुझे भी जता लेने दो..

    जानता हूँ डाल दी है मिट्टी तुमने हर मर्ज पे अपने,
    पर ये कुछ दरारे जो बाकी हैं, मुझे भर लेने दो
    या फिर यूं करो कि खुद को मुझमे दफन रहने दो..

    दिली-किताब में रख कर जिनको तुम भूल चुकी हो,
    गुलाब से वो ख्वाब जिनकी पत्तियां भी सूख चुकी हो,
    रुको, फेंकना मत उन्हें, मुझे गुलदस्ते में सजा लेने दो
    फायदा कुछ तो मुझे भी अपना उठा लेने दो

    जो भी हुआ है अता उसे निभाती हो खुद से,
    बेशक कोई मदद एहसान नही लेतीं तुम मुझसे,
    यूँही तुम्हारी 'खुद्दारी' की कदर मुझे करते रहने दो
    पर फ़क़त बेवजह ही अपने साथ खड़ा रहने दो

    तकिया जो तेरे अश्को का नमक खाता है
    गले लगता है तुझसे तेरे सब गम छुपाता है,
    यकीनन में भी तुमको तमाशाई न होने दूंगा
    एक बार मुझे अपने सिरहाने रहने दो
    तुम में डूब जाऊं ऐसा सैलाब बहने दो

    नही कोई दिलचस्पी इन रंगीनियों में मुझको
    बस यूँही यादों के कमरे में बंद रहने दो
    जिस चांद में हर रोज़ होता है दीदार तेरा,
    ताउम्र उसे मेरी खिड़की पे टँगा रहने दो

    वक्त को सुनसान पाते ही कलम कागज़ पर दौड़ने लगती है,
    हर रात इस सफर में , यादों की झड़ी सी लगती है
    हां शायर हूँ मै नाम का, पर वजह यही रहने दो
    लफ्ज़ कोई भी हो, एहसास "तुम्हीं' बस "तुम्हीं" रहने दो
    ©saiPriya