• t_h_e_satyam_shukla_ 13w

    हाँ मेरी औक़ात तो नही उस चाँद को पाने की ...
    पर चाहत रखता था उसे अपना बनाने की..
    सपनों में उसे मैं रोज़ तरासा करता था ...
    उसकी खुबसुरती को अपने होंठो से लगाकर रोज़ निखारा करता था ...
    पर उसने मेरे तरासने को कुछ और समझ लिया .
    मेरे प्यार को उसने खेल समझ लिया अब तो दूरी होगई ह ...
    उस चाँद से जिसे मैं तरासा करता था .
    ©t_h_e_knight_