• kavish_kumar 1w

    मैं एक चिंगारी आत़िश की, जिसकी लहक हो तुम..
    जो गुल खिलते हैं कागज पर, उसकी महक हो तुम..
    जलता सहरा मेरे मन में,जिसकी तुम ठंडी झील हो..
    चपलता है हाव-भाव में, तुम बड़े ही सुशील हो..
    बेरंग भाव है नीरसता के,जिसका तुम गहरा स्नेह हो..
    सूखा विराना में कभी से जिसका तुम बरसता मेह हो..
    © Aatish ��