• prachi_tulsyan 12w

    "गुज़रता वक्त अपनी अनूठी छाप छोड़ता है ।" इसी भाव के साथ एक छोटी सी प्रस्तुती । गलतियों के लिए क्षमा चाहूंगी।��


    समय कब बीत गया पता ही नहीं चला,
    जीवन के स्वर्णिम क्षण कहाँ लुप्त हो गए खबर ही नहीं लगी ,
    पर उन पलों के अनसुलझे पहलुओं को सुलझाना अभी बांकी है,
    इस अनंत पत्र रूपी जीवन के अनुत्तरित उलझते प्रश्नो के सटीक जवाव ढूंढने बांकी है ।

    बचपन से यही सीख मिली सफलता की दौड़ में असफलताओं के काँटों का आना निश्चित है ,पर डरकर रुकना मत
    जीवन में उचाईयों की सीढियाँ चढ़ते वक्त अकेला होना निश्चित है पर थमना मत
    वरन सवालों के मेले में कई प्रश्न अनछुए ही रह जायेंगे ,
    दिल अफसोस के गड्ढे में कुछ यूँ दफ़न हो जायगा की ,
    बस एक ही भाव की गूंज होगी ,
    समय कब बीत गया पता ही नहीं चला ।

    एक वो समय था जब माँ - बाप हमें हाथ पकड़कर चलना सीखाते, दुनिया की ठोस सच्चाई से अवगत कराते ,
    एक आज का दिन है जब हम उनकी उँगलियाँ पकड़कर उन्हें दुनिया के बदलते स्वरुप से रूबरू कराते है ,
    कुछ यूहीं बचपन में वर्णमालाएं घसीटते - घसीटते
    न जाने कब हृदय तल और मानस पटल की गहराइयां अल्फाज़ बन कागज़ पर उतरती चली गई पता ही नहीं चला ,

    समय कब बीत गया पता ही नहीं चला।
    -प्राची तुलस्यान

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