• kamal_1655 37w

    और उस शाम मैंने तुम्हें चाँद की चाँदनी में देखा।
    तुम अलसाई थी, रात शर्मायी थी, काजल से सजी तुम्हारी आँखे पलके भी झपकाई थीं।
    और उसी वक्त देखा था मैंने तुम्हारे होठों के नीचे का वो तिल।
    आज तक वहीं पे रुका हुआ हूँ
    तुम्हारी मुस्कान पे यूँ ठहरा हुआ हूँ
    अब अपने हाथों को उसका लिबास और आँखों को उसका पहरेदार बना देने की ख्वाइश है।
    इजाजत हो तो आँखों में बसा लूं तुम्हें और तुम्हारे उस तिल को?
    दिल में समा लूं तुम्हे और तुम्हारे उस तिल को
    सुनो! पूरा दिल दिया था न तुम्हे अपना घर बनाने को!
    अब उसी दिल मे एक छोटी सी जगह मांग रहा हूँ उस तिल को बसाने को।
    वैसे मेरा दिल भी उस तिल का पता पूछ रहा था।
    मैंने समझाया उसे वो उसी के करीब आ रहा है।
    उसकी की दहलीज पे खड़ा, उसी में समा रहा है।
    और उस शाम मैंने तुम्हें चाँद की चाँदनी में देखा।
    -कमल