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    अनकहा प्रेम

    वक्त से कुछ लम्हें चुराकर,
    उन्हें तुम्हारे हाथों में सजाकर,
    जब मुस्कुराता हूँ,
    जिन्दगी की जद्दोजहद को भूल जाता हूँ,

    यूँ तो तुम कभी शिकवे जताती नहीं ,
    कभी किसी फरमाइश को बतलाती नहीं,
    फिर भी तुम्हारे मासूम चेहरे को देख पिघल जाता हूँ,
    कुछ कहो ना कहो पर मैं समझ जाता हूँ,

    जिम्मेदारी की बंधी बेड़ियों से होकर मजबूर,
    तेरी एक झलक से भी कभी कभी हो जाता हूँ दूर,
    पर जब वक्त को मना कर उसके लम्हें चुरा लाता हूँ,
    तब तुझपर प्रेम की मुस्कुराती बारिश बरसाता हूँ,

    वक्त से कुछ लम्हें चुराकर,
    उन्हें तुम्हारे हाथों में सजाकर,
    जब मुस्कुराता हूँ,
    जिन्दगी की जद्दोजहद को भूल जाता हूँ।

    -निधि सहगल
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