• sujata_writes 3w

    कतरा जल का।

    अनगिनत पल
    जिसमें होती रही
    मैं हतास

    ज़िंदगी में कितनी
    दफ़ा आती रही
    उलझनें
    जिसे सुलझाना
    आसान नहीं था

    कचनार के फूल की
    भाँति कितनी
    बार अलग हुयी मैं
    टहनियों से

    कितनी बार
    डगमगाती खिड़कियों से
    देखा था
    मैंने तुम्हारा राह

    और उन राहों
    पर साथ तुम्हारा नहीं
    उन तन्हाईयों का ही था
    जो जुदा नहीं हुआ अब
    तक मुझसे
    जैसे तुम हुए थे।

    मदमाती कोयल
    की आवाज में
    सुनाई देती रही
    अक्सर तुम्हारी बातें

    कितने ही जज़्बात थे
    अंतर्मन में
    जो मन में ही
    दब गए
    जैसे दब जाते है
    मुद्दे
    सरकारी कार्यालयों में।

    बदलते साल में
    कितनी ही चीजें हैं
    जिसे मैं छोड़ देना चाहती हूँ
    जैसे छोड़ देता है आकास
    बारिस की बूंदों को
    पर तुम्हारी यह
    स्मृतियाँ जो अलग नहीं
    हो रही मुझसे
    वह और समाती ही जा रही है
    मुझमे
    जैसे समा लेती है
    धरा जल के
    एक एक कतरे को।
    @sujata_writes