• suhaan 18w

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    अपराध

    विवाह के पवित्र बंधन में
    अपनाया था मैंने तुम्हें....
    तुम्हें हरसंभव खुशी देने का
    वचन लिया था...
    अपने अपार स्नेह से
    सरोबार कर देना चाहता था...

    पर मेरा अथाह प्रेम नहीं ले सका
    थाह तुम्हारे मन की,
    तुम्हारे कलंकित हृदय की...
    जिसे प्रेम की नहीं
    पैसों की पिपासा थी...
    धन लोलुपता के वशीभूत
    तुम्हारी आंखें
    नहीं देख पायी मेरा समर्पण भाव...
    नहीं भांप सकी मेरे प्यार की गहराई


    तुम्हारे दहेज प्रताड़ित होने के स्वांग ने
    न केवल हमारे रिश्ते की शुचिता को,
    बल्कि मेरे अस्तित्व को भी धूमिल कर दिया
    स्त्री वेदना के खरीदारों ने
    हाथों हाथ खरीद लिए तुम्हारे प्रपंच
    और मेरा पुरुष होना ही
    मेरे दोषी होने का साक्ष्य बन गया


    मेरे परिवार की दुर्दशा....
    समाज की तिरस्कार भरी नज़रें
    चुभती हैं मुझे हर दिन
    कचोटती है मुझे हर रात...
    इसलिए..
    करता हूँ आत्मसमर्पण
    मृत्यु के समक्ष मैं आज
    कि शायद इसके अंधकार में
    मेरे दामन पर लगे वो स्याह दाग
    लुप्त हो पाएँ....
    और शायद वहीं जाकर
    समझ पाऊँ मैं अपना
    अपराध।


    ©suhaan