• ashu11 23w

    बगिया में अब तेरे फ़ूल ही नही तो सावन का इंतजार कौन करे
    ख़ुश्क पड़ी आंखों को अब बेवजह आबशार कौन करे।

    तेरे महफ़िल में मेरी मौत का सामान है मुझे मालूम है
    मगर अब कोई अपना ही नही तो खबरदार कौन करे।

    आज इरादा बदल दिया यही सोचकर
    बेपनाह मोहब्बत के बाद नफरतों के लिए खुद को इतना तलबगार कौन करे।


    तेरी खुशबू भी नही इन साँसों में महकती अब
    तू ही बता अब क़ज़ा के मौसम को गुलज़ार कौन करे।

    हर रोज़ नए मरहम लगते है मेरे ज़ख्मों पे
    पर उनपर तेरा हाथ ही नही तो उन्हें असरदार कौन करे।

    जितना समझना था तुझे अब समझ लिया है तुझे अब और समझना पड़े खुद को इतना समझदार कौन करे।

    गुनाह-ऐ-इश्क़ ने इस कदर सज़ा दी हमे
    कि अब तूम ही बताओ ऐ आशु-ए-दिल ये गुनाह बार बार कौन करे ।।
    ©ashu11